Kaafal Ek Katha “काफल पाको मैं नी चाखों“

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काफल पाको मिन नी चाखों

पहाड़ो से भले ही पलायन कर चुके लोग की आत्मा षान्त हो लेकिन ग्रीश्म ऋतु के दिनों में आज भी उस अभागी चिडियां की तरह काफल चखने के लिऐ लालायित रहती है। पहाडों की हरयाली सिर्फ पहाड़ को ही नहीं लुभाली बल्कि यह दस्तक दूर तक किसी के जेहन में जाती है। ग्रीश्म ऋतु आते ही जंगलों में यहां के लोगों की चहल-पहल भी बढ़ जाती है इसका मुख्य कारण जगलों के रस भरे ससीले फल है काफल।पहाड़ो में रहने वालो लोगांे का जगलों से गहरा नाता है। यहां से घास, लकड़ी ही नहीं कई तरह की सब्जियां और फल भी लोग उपयोग करते हैं। ऐसा ही एक फल है काफल है।

काफल के वृक्ष मुख्यतः 1000 मीटर से 2100 मीटर की ऊचाई पर पाये जाते हैं। ग्रीश्म ऋतु में पकने वाल ये बैंगनी-लाल रंग के फल रसीले खठे-मीठे होते हैं नाम सुनने से ही मुॅह में पानी आ जाता है। जिन गांवों में काफल अधिक मात्रा में पाये जाते है वहां के लोग टोकरियां भर-भरकर अपने सगे रिस्तेदारो को दूर दराज के गावों तक पहुंचाया करते हैं। और जिन गांवों में काफल नहीं होते है वे अपने रिष्तेदारो से आस लगाये रखते हंै।काफल पर यहां लोकगीत और कहानियां गढ़ी गई हैं जो इस फल की महत्ता बताती हैं।

एक कहानी के मुताबिक एक गांव में एक महिला अपने बेटी के साथ जीपन यापन करती थी काफल पकने के दिनों में दोनो बेहद खुष हुआ करते थे। एक दिन महिला काफल इकट्ठा करके टोकरी भर कर अपने घर लायी, गर्मी के दिनों में प्यास लगी परन्तु घर में पानी था। महिला ने अपनी बेटी से कहा कि मैं पंदेरे ( नल ) पर पानी भरने जा रही हॅू जब तक मैं न आंऊ तुम काफल मत खाना। बेटी चुपचाप टोकरी के पास बैठकर मां का इन्तजार करने लगी। जब महिला वापस आयी तो उसने महसूस किया कि टोकरी में कुछ ही काफल कम हो गये हैं। उसे लगा कि बेटी ने उसका कहना नहीं माना, गुस्से में उसने बेटी पर जोर से थप्पड़ मार दी। ग्रीश्म ऋतु के दिनों में बेटी इस थप्पड़ को सहन न कर सकी और उसकी मृत्यु हो गयी। उसके प्राण एक चिडियां में चले गये। आज भी काफल पकने के समय के समय महिने भर यह चिड़िया पहाड़ों में आती है और लगातार कहती है “काफल पाको मैं नी चाखों“

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